Maulin Shah : Vanche Gujarat ! Vichare Gujarat ! Jaage Gujarat !

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Thursday, 29 May 2014

શું હાલની સરકાર (હા સરકારના જ સાંસદો !!)  કે મીડિયા વિરોધપક્ષ ની ભુમીકા માં આવી શકે ?
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નવી સરકાર સામે કોઈ વિરોધ પક્ષ જ નથી રહ્યો એ લોકશાહી માટે બહુ ચિંતાનો વિષય કહેવાય અને સાથે સાથે જે રીતે ઈલેક્ટ્રોનિક મીડિયાના પક્ષપાતી વલણ ને હવે સામાન્ય નાગરીકો પણ સમજવા લાગી છે ત્યારે તેવી પરીસ્થિતમાં  પ્રિન્ટમીડિયા એ વિરોધ પક્ષની ભૂમિકા ભજવવી પડે એવા દિવસો આવ્યા છે. સાથે સાથે વિરોધ નો સ્વર સોસીઅલ મીડિયા પર પણ સારી રીતે રેલાય એ જરૂરી છે. એ યાદ રાખવુજ રહ્યું કે  ભિન્નમત એ લોકશાહીનો પ્રાણવાયુ છે...!!

સંસદમાં વિરોધપક્ષ નિર્બળ હોય ત્યારે શ્રી જવાહરલાલ નહેરુના શબ્દોને યાદ કરવા પડે. નહેરુની લોકપ્રિયતા એટલી જબ્બર હતી કે સંસદમાં વિરોધપક્ષ જેવું કાઈ હતું જ નહિ એનાથી નહેરુ ખૂબ વ્યથિત થઇ ગયા અને પોતાના જ પક્ષના સાંસદોને બોલાવીને કહ્યું:  "તમારે વિરોધ પક્ષની પણ ભૂમિકા ભજવવાની છે" !!

જો કે અત્યારે સંસદ માં પરિસ્થતિ સાવ નેહરુયુગ જેવી પણ નથી. ભાજપા સિવાયના પક્ષો ના સાંસદો તો છે જ . પણ હાલ ના વડાપ્રધાનની કાર્યશૈલી અને સ્વભાવ ને જોતા લાગતું નથી કે નેહરુ જેવી વ્યથા એમને અનુભવાય !

વડાપ્રધાન ન હતા બન્યા ત્યારે મોદી એ રેલીમાં અને ઈન્ટરવ્યુંમાં બહુ જ સ્પષ્ટ ભાષામાં કહ્યું હતું કે " જે ક્રિમિનલ સાંસદો હશે એની યાદી બનાવીને હું સુપ્રિમ કોર્ટને સોપી દઈશ એ સાંસદો પછી ભાજપના હોય કે બીજા અન્ય પક્ષના હોય " આ બહુ જ આવકારદાયક અને હિમતભર્યું વચન છે.
પરંતુ એની શરૂઆત ઘરથી જ શરૂ થવી જોઈએ ગુન્હાહિત રેકોર્ડ ધરાવતા સાંસદો સામે પગલા લેવાની હિમ્મત મોદી એ બતાવી છે એ લોકશાહી માટે શુભ શરૂઆત છે.
આ ઈશ્યુમાં મોદી સામે સાંસદો જ વિરોધ પક્ષની ભૂમિકા ભજવે એવી શક્યતાઓ ઘણી છે..!

આવા ઘણા મુદ્દા , પ્રજા ની વધુ પડતી અપેક્ષાઓ અને પડકારો મોઢું ફાડીને સરકાર સામે ઊભા છે...!

~ મૌલીન શાહ , અમદાવાદ
(સૌજન્ય : ગુજરાતી દૈનિક પર થી એડિટ કરી ને)

Monday, 25 February 2013

पवार को याद आई सोनियाजी की सियासी कुर्बानी !!



कहते हैं राजनीति में कोई भी बात पुरानी नहीं होती. कम से कम श्रीमती सोनिया गांधी का प्रधानमंत्री पद को ठुकराना तो भारतीय राजनीति की वो बात है, जिसे कांग्रेस कभी पुरानी होने भी नहीं देना चाहेगी..
लेकिन अब तो वो लोग ही सोनियाजी की इस सियासी कुर्बानी को याद करने से गुरेज नहीं करते जो कभी सोनियाजी  के मुद्दे पर ही कांग्रेस से अलग हुए थे.
श्री शरद पवार को तो आप जानते ही हैं. और ये भी जानते ही होंगे कि उन्होंने एनसीपी क्यों बनाई थी. लेकिन आज जब वो सियासत के पुराने पन्नों को पलटते हैं, तो सोनियाजी के लिए शहद भरे बोल जुबान से खुद ही टपक पड़ते हैं...
एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने कहा, 'वो विवाद हमने ही खड़ा किया था. पर एक बात मुझे माननी होगी कि प्रधानमंत्री पद का मुद्दा हमने उठाया था. लेकिन हमें बाद में समझ में आया कि इतना बड़ा प्रधानमंत्री का पद उन्हें मिल रहा था लेकिन उन्होंने स्वीकार नहीं किया, ये सोनियाजी का बड़प्पन है.'...
सत्ता के समीकरण होते ही ऐसे हैं. जब विरोध में रहें तो जमकर विरोध करें और जब हाथ मिल जाए तो दोस्ती तो निभानी ही पड़ेगी. घड़ी की सुइयों के साथ पवार के बदलते तेवर और बोल तो कम से कम इसी ओर इशारा करते हैं.
~मौलिन शाह,अहमदाबाद

Friday, 21 September 2012

प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने डीज़ल मूल्य वृर्द्दि ,एलपीजी सिलेंडर और एफडीआई के मुद्दे पर राष्ट्र को संबोधित किया :देशवासी बहकावे में न आयें


Prime Minister Dr. Manmohan Singh today addressed the Nation, defending the economic reforms which were introduced last week. He said that it's time for hard decisions,need your trust & support for inclusive growth & for betterment of country !
  • प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आज कहा कि ‘‘कठिन फैसले’’ लेने का समय आ गया है और देशवासियों को उन लोगों के बहकावे में नहीं आना चाहिये जो एक बार फिर 1991 जैसा भय फैलाना चाहते हैं.
  • खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, डीजल के दाम बढ़ाने और सस्ते गैस सिलेंडर की आपूर्ति सीमित करने जैसे फैसलों को उचित ठहराते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि निवेशकों का विश्वास बहालन करने के लिए कठिन फैसले लेना जरुरी हैं.
  • राष्ट्र के नाम दूरदर्शन पर दिये गये संदेश में सिंह ने कहा कि रिटेल में एफडीआई की अनुमति देने से जुड़ी चिन्ताएं निराधार हैं क्योंकि छोटे और बड़े खुदरा कारोबारियों के आगे बढ़ने की पर्याप्त गुंजाइश है.
  • प्रधानमंत्री ने कहा कि 1991 में जब वित्त मंत्री के रुप में उन्होंने आर्थिक सुधार शुरु किये तब भी इसी तरह का भय फैलाया गया था. उन्होंने कहा कि इस तरह का भय फैलाने वाले तब भी सफल नहीं हुए थे और अब भी वह सफल नहीं हो पाएंगे.
  • डीजल के दाम बढ़ाने और सस्ते एलपीजी सिलेंडर की संख्या सालाना छह तक सीमित करने के फैसले को सही ठहराते हुए उन्होंने कहा कि कठिन आर्थिक हालात और राजकोषीय घाटे को बढ़ने से रोकने के लिए ऐसा करना जरुरी था क्योंकि ऐसा नहीं होने पर आवश्यक वस्तुओं की कीमत में बेतहाशा वृद्धि होती.
  • सिंह ने कहा कि कोई भी सरकार आम आदमी पर बोझ नहीं डालना चाहती लेकिन सरकार की यह जिम्मेदारी भी है कि वह राष्ट्र हितों की रक्षा करे और अपनी जनता के दीर्घकालिक भविष्य की सुरक्षा करे.
  • उन्होंने कहा ‘‘वर्ष 1991 में हमने इसी तरह की समस्या का सामना किया था. कोई भी हमें छोटी रकम का कर्ज भी देने को तैयार नहीं था. लेकिन मजबूत और ठोस कदमों की बदौलत हम उस संकट से बाहर आये. आप उन कदमों के सकारात्मक नतीजे देख सकते हैं.
  • उन्होंने कहा कि आज हालात वैसे नहीं हैं लेकिन इससे पहले कि जनता का विश्वास हमारी अर्थव्यवस्था से उठ जाए, हमें कार्रवाई करनी ही चाहिए. सिंह ने कहा कि सरकार ऐसे मोड पर है, जहां वह विकास की मंद गति को पलट सकती है. हमें घरेलू और वैश्विक स्तर पर निवेशकों के विश्वास को पुनर्जीवित करना है. इस उद्देश्य से वे फैसले करने जरुरी थे, जो हमने पिछले दिनों किये.
  • मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई की अनुमति देने, डीजल कीमत में पांच रुपये की बढ़ोतरी और सब्सिडी वाले एलपीजी सिलेंडरों की संख्या सीमित करने को लेकर देश भर में मचे बवंडर के परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम आज 15 मिनट के संबोधन में मजबूती के साथ सरकार का पक्ष रखा..